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| Date : 05-May-2009 |  |
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बाबा जयगुरूदेव जी महाराज खितौरा में ही हैं और वहाँ अपनी प्रेममयी मौज में जीवों पर दया कर रहे हैं। सत्संग और नामदान की आस लिए प्रेमीजन खितौरा में आ रहे हैं। आपने संदेश में बाबा जी ने कहा कि जब नामदान मिल जाऐ और उसको याद कर लो तब आप उसका अभ्यास किया करो। अभ्यास कहते हैं ध्यान-भजन और सुमिरन। घाट पर बैठकर मन को रोककर कमाई करोगे तो आत्मधन मिलेगा। बाहर का आत्मधन अलग है और जीवात्माओं का धन अलग है। नामदान ले लिया और घर बैठ गए तो जैसे सब हैं वैसे तुम भी हो। नामदान लिया है तुमने कमाई करने के लिए। नामदान इस लिए दिया जाता है कि सब लोग अभ्यास करेंगे। यह बात नये और पुराने सभी प्रेमियों को समझ लेनी चाहिऐ कि नामदान क्यों दिया जाता है। साधन के लिए विरह और प्रेम जरूरी है। विरह की आग भड़केगी, अन्तर में जलेगी तो दुनियां की माया-छाया दूर हो जाऐगी और तब यह समझ में आऐगा कि हमने अपना कितना समय खो दिया। जब विरह की आग मालिक से मिलने के लिए उठ जाती है तो संसार कुछ नहीं। लेकिन सत्संग में आपको आना होगा क्योंकि यह विरह की आग सत्संग में ही सुलगाई जाती है। जिससे ज्यादा प्रेम होता है उस ओर खिंचाव होता है। इसीलिए सतगुरू से प्रेम लगाना चाहिऐ। जब रास्ता मिल जाऐ तब साधना में लग जाना चाहिऐ, सुस्ती नहीं करनी चाहिऐं दोनों आँखों के पीछे घाट है जहाँ मालिक बैठा है। अन्तर घाट पर जब गुरू मिलेंगे तब काम बनेगा। श्रद्धा और विश्वास जरूरी है। जब अन्तर में दर्शन होगा तब विश्वास हो जाऐगा। |
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