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जयगुरूदेव समाचार
Date : 04-Feb-2010
 बाबा जयगुरूदेव जी महाराज से एक सत्संगी ने अपने साधन-भजन के बारे में जब बताया तो स्वामी जी महाराज ने कहा कि जब तुम अभ्यास में बैठो तो इस बात का ध्यान रखो कि मन शान्त रहे, बाहर न जाऐ और दूसरी चीजों के बारे में फिजूल बातें न सोचे। जब तुम सुमिरन द्वारा शरीर के आखों तक का भाग खाली करके तीसरे तिल में ध्यान रखोगे तक तुम्हारा ध्यान शब्द-धुन को पकड़ेगा। आवाजें बहुत हो रही हैं किन्तु घण्टे की आवाज को सुनता है और बाकी आवाजों को छोड़ देता है। धीरे-धीरे इस अभ्यास द्वारा आत्मा शरीर को छोड़ देगी, आंखों में प्रकाश एकत्र होगा और वो बलवती होगी। फिर अपने ध्यान को दिखाई देने वाले तारे में जमाओ तथा शब्द को सुनो और बाकी सभी चीजों को भूल जाओ। पीछे यह तारा टूटकर बिखर जाऐगा तब तुम देखोगे कि इसके अन्दर और इसके आगे क्या है। इस तारे को पार करने के बाद सूरज और चांद को पार करोगे तब गुरू का स्वरूप सामने दिखाई देगा। जब यह रूप स्थिर हो जाऐगा तब यह तुम्हारे सभी प्रश्नों का जवाब देगा और तुम्हें ऊंचे आध्यात्मिक मण्डलों में रास्ता दिखाऐगा। खूब लगन के साथ दो आंसू गिराकर भजन-ध्यान रोज करना चाहिए।
महात्मा समझदारी से काम करते हैं
 बाबा जयगुरूदेव जी महाराज ने कहा कि यहां सत्संग में आकर कोई भी व्यक्ति खाली हाथ नहीं जाता, उसे कुछ न कुछ लाभ होता ही है। यह बात अलग है कि तुम इस बात को न समझ सको और वह भी इसलिए कि तुम्हें पीड़ाऐं बहुत ज्यादा हैं और थोड़ा बहुत लाभ होता है तो वह पता नहीं लगता और तुम रोते ही रहते हो। लेकिन यह भी सच है कि तुम्हारी सब तकलीफों को दूर कर दिया जाऐ तो तुम कभी लौटकर इधर आओगे ही नहीं। महात्मा समझदारी से काम करते हैं और वो धीरे-धीरे तुमसे प्रेम करा लेंगे और तुमको हमेशा के लिए सुख मिल जाऐगा।
 प्रेम एक तरफ रहता है और कानून एक तरफ है। अगर तुम सच्चा प्रेम कर लो तो तुम धीरे से सब बन्धनों से मुक्त होकर निकल जाओगे और काल भगवान का कानून एक तरफ धरा रह जाऐगा।
 घाट जगाती क्या करे, जो सिर बोझ न होय।।
 तुम सत्संग में लगोगे, गुरू पर विश्वास आऐगा। ध्यान-भजन करोगे तो गुरू की कृपा होगी तो कर्मों के बड़े-बड़े पहाड़ जल जाऐंगे और जन्म-मरण से आजाद हो जाओगे। जब कर्म ही नहीं रहेंगे तो दुख-सुख भी नहीं रहेगा।
 जब ये दुनियां बनी थी उस समय पर कोई पाप-पुण्य का कानून नहीं था, सब योगी-विज्ञानी थे। जब से पाप-पुण्य के कानून बने तबसे धीरे-धीरे तुम अच्छे-बुरे कर्मों में बंधते चले गऐ। अब कर्मों का पहाड़ इतना इकट्ठा कर लिया कि जीवात्मा अपना होश खो बैठी। एक समय आऐगा जब सब लोग सत्य की पुकार फिर करने लगेंगे। यहां की तो बात ही क्या स्वर्ग-बैकुण्ठ आदि लोकों से भी लोगों को अरूचि हो जाऐगी।-(जून 1991)

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