| Date : 06-Feb-2010 |  |
|
आज वयोवृद्ध सत्संगी बहन श्रीमती तारादेवी श्रीवास्तव का देहावसान हो गया। वे संत चिरौली आश्रम कृष्णानगर, मथुरा में रहती थीं। उनका शरीर वहीं छूटा। उनके पार्थिव शरीर को जयगुरूदेव आश्रम, मथुरा-आगरा बाईपास पर लाया गया और अंतिम यात्रा यहीं से आरम्भ हुई। बहुत सारे सत्संगी-प्रेमी मरघट (शमाशान) तक गए। वहां स्वामी जी महाराज ने पुरानी बातें याद कीं और पूरा समय दिया। स्वामी जी महाराज अपनी गाड़ी में बैठे थे। उन्होंने कहा कि ‘‘यह जयगुरूदेव मरघट है, यहां पर दाहसंस्कार होता है।’’ उन्होंने आगे कहा कि ‘‘बिजली से जब लाश जलाई जाती है तो पांच मिनट में सबकुछ जलकर राख हो जाता है लेकिन इस अग्नि संस्कार में अस्थियां मिल जाती हैं जिन्हें पवित्र नदियों में प्रवाहित किया जाता है।’’ स्वामी जी ने तारा देवी की बेटी को याद किया और कहा कि किरन को बुला लो। उनके बेटे शान्तिकुमार ने मुखाग्नि दी। दाहसंस्कार के दौरान तीन प्रार्थनाऐं की गईं। स्वामी जी ने कृष्णा नगर में रहने वाले दिवंगत बालमुकुन्द को याद किया और कहा कि वा रिक्शा चलाता था। बालमुकुन्द 1958 से आश्रम पर रह रहा था। यहीं पर उसने अपनी घर-गृहस्थी बसाई और आश्रम के पास ही अपना मकान बनवा लिया। स्वामी जी महाराज ने तारादेवी के पति विश्वनाथ लाल श्रीवास्तव को भी याद किया जिनका निधन 1957 में हुआ था। विश्वनाथ जी स्वामी जी के प्रेमी भक्त थे। स्वामी जी महाराज ने एक बार कहा था कि ‘‘वो बहुत अच्छा प्रेमी था और मर्यादा में रहता था। साथ में यह भी कहा कि ‘‘उसकी इच्छा थी कि उसके अन्तिम समय पर मैं सामने रहूं।’’ उनकी इच्छा स्वामी जी ने परी की। गोरखपुर में सत्संग का कार्यक्रम रद्द करके बनारस पहुंच गए। विश्वनाथ जी ने स्वामी जी महाराज के आगे एक फरियाद किया कि मैं बच्चों को आपके सहारे छोड़ रहा हूं। स्वामी जी महाराज ने उसको निभाया, अब भी निभा रहे हैं। तारादेवी बच्चों के साथ पुराने आश्रम (संत चिरौली आश्रम, मथुरा) में रहती थीं। info@jaigurudevworld.org www.jaigurudevworld.org |