| Date : 09-Mar-2010 |  |
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देश की लोकसभा और राज्यसभी में महिला आरक्षण विधेयक को लेकर काफी हंगामा हुआ और पास न हो सका। मंहगाई का मुद्दा उसके आगे ठंडा पड़ गया। समाचारों को सुनने के बाद बाबा जयगुरूदेव जी महाराज ने कहा किः-
बहुमत तियमत बालमत, बिन नरेश को राज। सुख सम्पदा की कौन कहे, प्राण बचे बड़ भाग।।
बाबा जी ने प्रेमियों से कहा कि ये वक्त भजन कराने का ज्यादा है क्योंकि आगे विपदा आने वाली है। भजन करोगे तो वो पास से निकल जाऐगी, सीधी तुम पर नहीं गिरेगी। भजन अगर तुम नहीं करोगे तो सीधी आकर तुम पर गिरेगी। इसीलिए अपना ध्यान बनाये रहो तो सिमटाव होता रहेगा। जब-जब समय मिले भजन-ध्यान में बैठ जाओ। ध्यान में दोनों आंखों के पीछे तीसरा तिल है उस पर एकाग्रता होनी चाहिऐ। अगर गुरू का स्वरूप अन्तर में बिना किसी कोशिश के ठहर जाता है तो अच्छी बात है और स्वरूप तीसरे तिल पर नहीं ठहरता है तो ध्यान कच्चा है। उस समय स्वरूप का ध्यान करने के बजाय तीसरे तिल में अंधेरे को देखना चाहिऐ और बिना आसन बदले नाम का जाप करना चाहिऐ। यह मन को तीसरे तिल पर जमाये रखेगा और डेढ़ घण्टे या उससे भी पहले जब मन एकाग्र होगा तो सुरत यानी जीवात्मा शरीर को खाली करना आरम्भ कर देगी। जब शरीर कन्धों तक खाली हो जाऐगा तो अंधेरे में ज्योति आऐगी। जब अंधेरे की जगह रोशनी दिखाई देने लगे तो आसन बदले बिना सुमिरन जारी रखना चाहिऐ। वक्त आने पर गुरू का प्रकाशमय स्वरूप भी सामने आ जाऐगा। स्वरूप वही होगा जो गुरू का यहां भौतिक रूप है। ध्यान एकाग्रता का फल है औऱ एकाग्रता सुरत को तीसरे तिल पर कायम रखकर जाप करने का फल है। इसलिए पहले सुमिरन से एकाग्रता प्राप्त करनी चाहिऐ। जब एकाग्रता स्थिर हो जाती है तो स्वरूप अपने आप ही आ जाता है। जब सुरत की धारायें आंखों के ऊपर जमा होनी शुरू हो जाती हैं तो कुछ न कुछ ज्योति चाहे कितनी धीनी हो जरूर दिखाई देंगी और पांव तथा पिण्डलियां जरूर सुन्न हो जाऐंगी। जैसे मौत के वक्त जीवात्मा शरीर से अलग हो जाती है उसी प्रकार संतमत की साधना से जीवात्मा शरीर से निकल जाती है फिर ऊपर के रूहानी मण्डलों की सफर करती है, उड़ती है फिर वापस शरीर में आ जाती है। इसी को जीते जी ही मरना कहते हैं। महात्माओं ने कहा है किः-
जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द। मरने ही ते पाइये, पूरन परमानन्द।।
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