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जयगुरूदेव समाचार
Date : 25-Jul-2010

गुरूपूर्णिमा विशेष
    आज पावन गुरूपूर्णिमा पर्व है और सत्संग कार्यक्रम का पांचवा दिन है। आज इस आध्यात्मिक कार्यक्रम में आने वाले लोगों का अपार जनसमूह यहां सत्संग मैदान में उपस्थित है। सत्संग मैदान पूरा भरा हुआ है। जितनी उपस्थित सत्संग मैदान में है उससे अधिक बाहर है और उससे अधिक मेला कैम्पों में है। भारी भीड़ यहां बराबर आ रही है। गुरू पूर्णिमा पर आऐ ये गुरू के मतवाले लोग गुरूदर्शन के लिए लालायित हैं। दूर-दूर से आने वाले ये सत्संगी प्रमी  अपने-अपने जिलों व प्रान्तों के क्ैम्पों में ठहरे हुऐ हैं। सभी जिलों के भण्डारे चल रहे हैं। आज पर्व है इसलिए सभी जिलों में आज पक्का भोजन बन रहा है।
    मन्दिर में बराबर पूजा चल रही है। आने वाले लोग अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार पूजा करके प्रशाद ग्रहण कर रहे हैं। आज भी लोग आ रहे हैं और सत्संग सुनकर प्रशाद ग्रहण कर रहे हैं।
    आज प्रातः 6 बजे नामयोग मन्दिर के प्रांगण में बने भव्य सत्संग मंच से बाबा जयगुरूदेव जी महाराज ने अपने संदेश में कहा कि उस मालिक ने आपको मनुष्य शरीर दिया है ताकि आप भजन कर लें। पर आपने इस अनमोल शरीर को दुनियां के कामों में लगा दिया। संसार के काम उतने करो जितने इस शरीर रक्षा के लिए जरूरी हों शेष अपने अनमोल समय को अपनी जीवात्मा के कल्याण में लगाकर इसे जगा लो और इसे यहां से निकालकर इसके अपने देश, सत्तदेश पहुंचा दो। यह समय आपको फिर दोबार नहीं मिलेगा। आपको जो स्वांसे मिली हैं उन्हें भजन में लगा दो।
    तुम यहां जब से आऐ हो तब से यहां से निकल नहीं पाऐ हो। काल के जाल में फंसकर तुम अपनी सुध-बुध खो बैठे हो। जीवात्मा यह प्रश्न अपने मालिक, गुरू से करती है कि आपने यहां मुझे क्यों भेजा और अब क्यों लेने आऐ हो। इस पर मालिक बताते हैं कि काल भगवान ने हमारी सेवा बहुत भारी की जिसके वशीभूत हम प्रसन्न हो गऐ और उसने हमसे एक वर मांग लिया। हमने उसे उसकी सेवा के फलस्वरूप तुमको दान में दे दिया। उसने अपनी एक अलग सृष्टि का निर्माण किया जिसमें उसने पाप-पुण्य के नियम बनाकर आपको मनुष्य शरीर में कर्म करने की आजादी दे दी। तुम उसके कर्मों के बन्धन मंे फंसते चले गऐ और आज इतने भारी कर्मों से लद गऐ कि अब आपके अन्दर यह ताकत नहीं है कि आप बिना महापुरूषों के इन बन्धनों से आजाद हो जाओ।
    सुरत कहती है कि आप अब हमें लेने क्यों आऐ हो ? तो गुरू कहते हैं कि जब उस परमात्मा ने यह देखा कि काल कर्मों का बन्धन बनाकर तुमको यहां भारी सजा देता है, बारबार जन्माता है और बारबार मारता है और फिर यहां से निकालकर आपके कर्मानुसार आपको नर्कों में भयंकर यातनाऐं और सजा देता है और फिर वहां से निकालकर आपको चौरासी लाख योनियों में डालता है जहां फिर से बेजुबानों को सजा और यातनाऐं देता है तो अब हमसे यह देखा नहीं गया और हम अब तुम्हें लेने आऐ हैं। अब तुम यहां से चलने की तैयारी करो और जो रास्ता हम बता रहे हैं उस रास्ते से चलो। सुरत पूछती है कि इस बात का क्या भरोसा है कि आप हमें फिर से काल के हाथ नहीं सौंपोगे ? तो गुरू कहते हैं कि अब यह मौज नहीं होगी। एक बार तुम हमारा कहा मानकर यहां से निकल चलो तो अब दोबारा तुम्हें यहां नहीं भेजेंगे।
    यह काल का देश है और आप और हम यहां काल के जाल में फंसे हुऐ हैं। महात्मा आकर हमें जगाते हैं और बताते हैं कि यह देश हमारा नहीं है यह काल का देश है और यहां का कोई सामान हमारा नहीं है। यहां जिसे आप अपना कहते हो वह सब तो पहले से ही उस ईश्वर ने आपके लिए यहां भेज दिया था। जब इन सामानों को आप साथ नहीं ले आऐ तो यहां से कैसे ले जा सकते हो ? इस लिए आप भजन का रास्ता लेकर भजन करो और यहां से गुरू की दया से निकल चलो। आज गुरू पूर्णिमा का पावन पर्व है। गुरू की दया लेकर आज से ही भजन-ध्यान आरम्भ कर दें। यह प्रण करें कि आज से बराबर ध्यान-भजन करेंगे।
    गुरू महाराज का आदेश है कि आप सब एक आदमी कम से कम सौ आदमियों को यह बताऐ कि आप शाकाहारी हो जाओ और किसी नशे की वस्तु का सेवन न करें जिससे कि बुद्धि पागल हो जाऐ और अपने पराये की पहचान खो जाऐ। यह आपका सहयोग है सतयुग आगवन का। आप सभी को इस आदेश का पालन करना है।
    सत्संग के बाद गुरू महाराज  ने नामदान दिया। यहां आने वाले लाखों नर-नारियों ने नामदान लेकर साधना प्रारम्भ कर दी है।
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