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जयगुरूदेव समाचार
Date : 29-Jul-2010
    प्रातः परम पूज्य स्वामीजी महाराज ने सत्संग दिया और पिछले महात्माओं और जीवों का अनुपम उदाहरण देते हुऐ समझाया कि जिस प्रकार करिया, सैनी, नैनू आदि ने लगन से और मेहनत से साधना करके अपनी जीवात्मा को जगा लिया उसी प्रकार आप भी अपनी जीवात्मा को जगाकर इसी जन्म में अपने घर पहंुचा दो। गुरू तो नौका लिए घाट पर हर समय तैयार है पर आपको घाट तक आना होगा। यही डगर पनघट की है जो थोड़ा कठिन है। किन्तु आप जब इस डगर पर मन को रोककर चलोगे तो आपको घाट भी जरूर मिल जाऐगा।
    परम पूज्य स्वामी जी महाराज ने कहा कि जब तक आप लोग यहां रहेंगे तब  तक रोज सत्संग होता रहेगा। सेवाओं का काम चल रहा है। सिमटाव का काम हो रहा है जिसमें सेवादार लगे हैं। सभी जिलों के सेवादारों से अपील है कि आप भी जब अपने कैम्प को छोड़ें तो अपने आस-पास सफाई करके ही जाऐं। स्वच्छ वातावरण होगा तो सभी के मन भी स्वच्छ होंगे और समाज में एक नया संदेश जाऐगा।
बीते हुऐ दिन-साधकों को हिदायत
    बाबा जयगुरूदेव जी महाराज ने साधकों को बताया कि साधन पर बैठने के पहले साधकों का इरादा पक्का होना चाहिए। साधन में जब मन न लगे तो खूब रोया करो। इसके पश्चात जब तुम बैठोगे तो मन शान्त हो जाऐगा। मन का स्वभाव है हरकत करने का। विवेक से यह मन शान्त जरूर रह सकता है वरना इसका रूकना असम्भव है।
    दोनों आंखों के पीछे मध्य भाग में जीवात्मा बैठी हुई है। तुम बिलकुल सामने एक टक देखते रहो। यह तुम्हारी बाहर की आंखें बराबर बंद रहनी चाहिऐं। अन्तर में पहले तुम्हें अंधेरा दिखाई पड़ेगा। देखते-देखते रोशनी प्रकट हो जाऐगी। जिस वक्त रोशनी का बिन्दु पड़ने लगे तो तुमको चाहिऐ कि अपनी निगाह बिन्दु पर रखो और ऐसी कोशिश करो कि तुम्हारी दृष्टि हिले-डुले नहीं। इसी बिन्दु में होकर देखते रहो फिर प्रकाश का समूह दिखाई देने लगेगा। आगे नीले रंग का आकाश है और प्रकाश सफेद है। इस आकाश में अनेक प्रकार की इच्छाऐं प्रकट हो जाती हैं। इन्हीं वासनाओं के जागने से साधक गिर जाता है और यदि गुरू न हो तो बचना अति दुष्कर हो जाता है। जब वासना का वेग जग जाता है उस वक्त गुरू याद नहीं आता है। गुरू की सेवा हमने लाखों बार की हो और गुरू की सूरत का हम हर रोज ध्यान करते हों फिर भी इन्द्रियों के मण्डल में पहुंचने पर साधक की इच्छाऐं जाग जाती हैं और यदि उस वक्त प्यारा गुरू सामने खड़ा भी हो तो वह दुश्मन की भांति नजर आता है। विकारी अंगों की वजह से हम गुरू को अधूरा समझते हैं। गुरू का ध्यान, सुमिरन करना तो दूर रहा उल्टा उसे गाली देना शुरू कर देते हैं और गुरू का मार्ग भी छोड़ देते हैं।
    जब विकारी अंग इन्द्रियों के जागते हैं उस वक्त यह इच्छा होती है कि सुन्दर स्त्रियां मिलें और हम उनके साथ रहें। सौ में से एक बचता है वह भी गुरू का सहारा लेकर नहीं तो लाख में से एक बचता है।
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