| Date : 29-Oct-2009 |
क्या आप जानते हैं ? ब्रह्म वेला यानी ब्रह्म मुहूर्त में परमात्मा से मिलने की साधना यानी भजन अच्छा बनता है। प्रभात के समय जब एक प्रहर रात बाकी रहती है उस शुभ मनोहर वेला को अमृतवेला कहते हैं। यह पवित्र समय ही प्राचीन काल काल में ऋषियों, मुनियों और योगियों ने ईश्वर भजन और आराधना के लिए चुना था। गुरूवाणी में भी इसकी महिमा कही गई है। गुरू नानक साहब ने कहा कि मालिक के सच्चे नाम से जुड़ने के लिए अमृतवेला का समय विशेष गुणकारी है। रात को नींद में आत्मा मस्तक में उतर कर कण्ठ या नाभी में एकत्रित हो जाती है। जब मनुष्य जागता है तब वो फिर से अपनी जागृत अवस्था के स्थान पर आ जाती है। यदि उस समय ही फिर पिण्ड को छोड़ने का साधन जो जड़ से चेतन को अलग करने का साधन है किया जाऐ तो आत्मा आसानी से शरीर को छोड़ सकती है क्यों कि आत्मा ने उस समय तत्काल ही शरीर के रोम रोम में प्रवेश किया है। साथ ही इस समय काम काज की चिन्ता नहीं होती और यह एकाग्रता प्राप्ति के लिए उचित समय है जो और किसी दूसरे समय में कठिन है। अमृतवेला में मन बिलकुल ताजा होता है। संतमत की साधना जीते जी मरने की साधना है। जैसे मौत के समय आत्मा शरीर से अलग हो जाती है ठीक उसी प्रकार साधन-भजन के द्वारा आत्मा शरीर से निकल कर आसमान के ऊपर स्वर्ग बैकुण्ठ आदि लोकों का सफर करने लगती है और ऊपर के लोकों का आनन्द लेने लगती है। महात्माओं ने कहा है कि:-
जीवत मिरतक हो रहो, तजो खलक आस। रक्षक समरथ सतगुरू, मत दुख पावे दास।। news@jaigurudevworld.org
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