| Date : 19-Nov-2009 |
क्या आप जानते हैं ? जब जीवात्मा जड़ योनि यानी पेड़ की योनि में आती है उसके बाद कीड़े की योनि में फिर पक्षियों में, इसके बाद पशुओं में और गाय और बैल की योनि समाप्त करने के बाद गाय को मनुष्य शरीर मिलता है और लड़की बनती है और इसी प्रकार बैल को लड़के का जन्म मिलता है। यह विधान है। वो जीव जो संतों के सम्पर्क में आ जाते हैं अर्थात किसी पेड़ का फल खा लिया, या उस पेड़ की दातून कर लिया या किसी कीड़े का सम्पर्क उनके शरीर से हो गया या किसी जानवर को स्पर्श कर लिया वह जीव शरीर छूटने के बाद मनुष्य यानि में जन्म लेता है। यह विशेषता संतों की है। संत उन्हें कहते हैं जो सत्लोक से आते हैं और ईश्वर, बह्म, पारब्रह्म रूपी उनके आधीन हैं। संत ही सबके सच्चे पिता हैं और उनकी मर्जी के खिलाफ एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। शुरू में सिवाय मालिक सत्पुरूष के यहां कुछ नहीं था, अरबों-खरबों वर्षों तक धुंधकार रहा। न जमीन थी, न आसमान था और न शब्द ही था। संतों ने बताया कि रचना की शुरूआत शब्द से हुई। सत्लोक से सुरतों यानी रूहों को नीचे उतारा गया। निरंजन भगवान ने कर्मों का विधान बनाकर जीवों को यहां फंसा लिया। संतों का अवतार हुआ वे सत्लोक से यहां आऐ और नाम भेद बताया कि ऐ जीवात्माओं तुम अपने घर चलो। काल ने तुम्हें यहां कर्मों का कानून बनाकर फंसा लिया है। जिन सुरतों ने महात्माओं की बातें मानकर, उपदेश लेकर पिछले वर्षों में भजन किया उनको उन्होंने अविचल देश सत्लोक में पहुंचा दिया। कलयुग का मलीन समय है। थोड़ी मेहनत और पूरी दया संतों की हो रही है। कबीर साहब ने कहा किः- कहें कबीर वा घर चलो, जहं काल न जाई।। news@jaigurudevworld.org |