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17 Nov 2009
Date : 17-Nov-2009
सवाल
सवाल-जवाब शैल कुमारी जी! आने शब्द-धुन के बारे में पूछा है। जिसका जिक्र संतमत की पुस्तकों में किया गया है।
जवाब
शब्द-धुन का मतलब है ध्वनि यानी आवाज। शब्द-धुन को नाम भी कहा जाता है, मुसलमान इसे आसमानी आवाज या कलमा कहते हैं। यह ईश्वरीय आवाज है जिसे जीवात्मा सुनती है जो इस मुनष्य शरीर में दोनों आंखों के पीछे बैठी हुई है। इस ईश्वरीय संगीत को सुनने का नाम है भजन। इसका भेद संत सत्गुरू से प्राप्त होता है जिसे दीक्षा कहते हैं। संतमत में इसे नामदान कहा जाता है। इस आन्तरिक शब्द-धुन को केवल आत्मा ही सुन सकती है। इसको सुन करके जन्मों-जन्मों की सोई सुरत (जीवात्मा) जाग उठती है और उसे सच्चा आनन्द प्राप्त होता है। भजन के अभ्यास में किसी प्रकार की थकावट अथवा परिश्रम नहीं होता। सुरत-शब्द योग आनन्द का मार्ग है। सुमिरन से परमात्मा की याद करनी पड़ती है और ध्यान में परमात्मा की नररूप, नूरी स्वरूप तथा शब्द रूप को स्थिर करना पड़ता है। इन साधनों को करके सुरत द्वारा शब्द में जुड़ना पड़ता है। जीवात्मा शब्द की एक बूंद है। शब्द ही गुरू है और गुरू ही शब्द है। इस बात को समझना चाहिऐ। सुरत जब शब्द में मिल जाती है तो शब्द रूप हो जाती है फिर उसे कोई बंूद नहीं कहता। शब्द रूपी समुद्र में मिलकर वो स्वयं परमात्मा हो जाती है। वह मालिक शब्द रूप है और सदा सबके साथ रहता है। वाणी में कहा है किः- शब्द स्वरूपी संग हैं, रहें न तुमसे दूर। धीरज रखियो चित्त में, दीखेगा सत् नूर।। news@jaigurudevworld.org
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