महापुरुष हमें पुकार रहे हैं — “यह संसार पराया है, अपने सच्चे घर सत्यलोक की ओर चलो।” बाबा जयगुरुदेव की वाणी जीवात्मा को कोमलता से अपने मूल धाम की ओर मोड़ती है।
यह संसार हमारा असली घर नहीं है। हम यहाँ परदेस में रह रहे हैं और पराए सामानों में उलझ गए हैं। यह मनुष्य शरीर एक “किराये का मकान” है, और हमारी साँसें इस मकान की पूँजी हैं — जो हर पल कम हो रही हैं।
यह मनुष्य शरीर बार-बार नहीं मिलता। इसलिए इस मौज का लाभ उठाकर अपनी जीवात्मा के कल्याण के लिए भजन कर लेना चाहिए — जब तक श्वास है, तब तक आस है।
भक्ति का मार्ग तलवार की पैनी धार पर चलने जैसा कठिन है — जहाँ केवल वही सफल होता है जो गुरु वचनों पर पूर्ण विश्वास करता है।
गुरु की सच्ची भक्ति का अर्थ है उनकी आज्ञा का पालन करना। पूर्ण विश्वास और भरोसे के साथ चलने वाला ही इस मार्ग को पार करता है।
जब महापुरुष हृदय में भक्ति का बीज डाल देते हैं, तो वह कभी नष्ट नहीं होता — समय आने पर अवश्य फलीभूत होता है। सच्ची भक्ति वही है जो विपत्ति में भी गुरु का साथ न छोड़े।
इस मार्ग पर चलने के लिए अपने शीश (अहंकार) को गुरु चरणों में रखना पड़ता है। जो जीव दीन और विनीत होकर गुरु चरणों को पकड़ लेता है, वह भवसागर से पार उतर जाता है।
बाबाजी ने नाम साधना के तीन मुख्य अंग बताए हैं — एक ही अंतर्धारा के तीन प्रवाह, जो जीवात्मा को निर्मल कर देते हैं।
प्रभु के नाम और रूप को निरन्तर याद करना — हर श्वास, हर कर्म में।
अपनी अंदर की आँख — तीसरे नेत्र — से उस दिव्य प्रकाश को देखना, जो अंधकार के पीछे छिपा है।
अंदर के कान से उस आसमानी देववाणी, उस दिव्य ‘शब्द’ को सुनना जो ऊपर से बुला रहा है।
जैसे पानी गंदे कपड़े को साफ कर देता है, वैसे ही ‘नाम’ की कमाई अंतःकरण और जीवात्मा पर जमी कर्मों की गंदगी को धो देती है। नाम साधना वह पौड़ी (सीढ़ी) है जिसके सहारे सूरत ऊपर चढ़ती है।
तभी जीवात्मा काल के जाल से मुक्त होकर अपने मूल स्वरूप की ओर बढ़ सकती है।
‘जयगुरुदेव’ नाम किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि स्वयं उस प्रभु परमात्मा का नाम है — उस दिव्य ध्वनि का वर्णनात्मक रूप जो ऊपर से हमें बुला रही है।
यह नाम परमात्मा का है, उस दिव्य सांउड का स्वरूप जो ऊपर से चलकर हर जीव को मौन रूप से पुकार रहा है।
प्राण निकलते समय या किसी असाध्य मुसीबत में ‘जयगुरुदेव’ नाम पुकारने से गुरु स्वयं जीव की हिफाजत और रक्षा करते हैं।
यदि कोई बेहोश हो तो उसके कान में दस बार यह नाम बोलने से उसे होश आ जाता है। जीवात्मा के लिए यह नाम वह टिकट है जिसे दिखाकर वह यमराज के दण्ड से बच जाती है।
जीवात्मा (सुरत) वास्तव में सतपुरुष का अंश है और उनके साथ अभेद थी। काल भगवान की सेवा से प्रसन्न होकर सतपुरुष ने सूरतों का भण्डार काल के हवाले कर दिया।
काल ने कर्मों का विधान बनाकर सुरतों को मृत्युलोक में फँसा दिया। यहाँ सूरत स्थूल, सूक्ष्म, कारण और लिंग शरीरों के आवरणों में ढकी हुई है। साधना के माध्यम से सुरत इन शरीरों को उतारकर सहस्रदल कमल, त्रिकुटी, सुन्न और महाकाल को पार करती हुई अपने असली घर — सत्यलोक — पहुँचती है।
गृहस्थ साधक के लिए सरल आचरण — कोमल, ईमानदार, शाकाहारी, नशा रहित और सेवा से भरा हुआ।
क्रोध से बचना चाहिए — क्रोध बुद्धि को नष्ट कर देता है। पति-पत्नी को आपस में प्रेम और मेल-जोल से रहना चाहिए।
सदा शाकाहारी रहें — मांस-मदिरा बुद्धि को पशुओं से भी नीचे गिरा देते हैं। नशा करने वाले जीव अपनी पहचान खो देते हैं और अंततः दुःखों को प्राप्त करते हैं।
अपने खेती, व्यापार या दफ्तर के काम में पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम करें। धोखे और चोरी से बरकत खत्म हो जाती है। दूसरों की सेवा और दया से ही आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने काशी के विद्वानों को आंतरिक मार्ग का संदेश दिया। प्रारम्भ में उन्हें बहुत विरोध सहना पड़ा — कुछ विद्वानों ने उन्हें नास्तिक तक कहा। परंतु तुलसीदास जी अपनी आंतरिक अनुभूति में दृढ़ रहे।
जब काशी के पंडितों ने उनसे दीक्षा लेकर साधना की, तो उन्हें भी गगन (आंतरिक आकाश) में अद्भुत प्रकाश और शब्द सुनाई देने लगे। उन्होंने सिद्ध किया कि बिना पूरे गुरु के जीव कर्मों के बंधन और चौरासी लाख योनियों के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता।