॥ जयगुरुदेव नाम प्रभु का ॥
“यह संसार हमारा असली घर नहीं है — यह मनुष्य शरीर एक किराये का मकान है,
और हमारी साँसें इस मकान की पूँजी हैं।”
— बाबा जयगुरुदेव
खण्ड २ · भक्ति का मार्ग

गुरु भक्ति: तलवार की धार पर चलना

भक्ति का मार्ग तलवार की पैनी धार पर चलने जैसा कठिन है — जहाँ केवल वही सफल होता है जो गुरु वचनों पर पूर्ण विश्वास करता है।

भक्ति का अर्थ

गुरु की सच्ची भक्ति का अर्थ है उनकी आज्ञा का पालन करना। पूर्ण विश्वास और भरोसे के साथ चलने वाला ही इस मार्ग को पार करता है।

भक्ति का बीज

जब महापुरुष हृदय में भक्ति का बीज डाल देते हैं, तो वह कभी नष्ट नहीं होता — समय आने पर अवश्य फलीभूत होता है। सच्ची भक्ति वही है जो विपत्ति में भी गुरु का साथ न छोड़े।

अहंकार का त्याग

इस मार्ग पर चलने के लिए अपने शीश (अहंकार) को गुरु चरणों में रखना पड़ता है। जो जीव दीन और विनीत होकर गुरु चरणों को पकड़ लेता है, वह भवसागर से पार उतर जाता है।

खण्ड ३ · नाम साधना

अंतःकरण की सफाई और शब्द की कमाई

बाबाजी ने नाम साधना के तीन मुख्य अंग बताए हैं — एक ही अंतर्धारा के तीन प्रवाह, जो जीवात्मा को निर्मल कर देते हैं।

सुमिरन

प्रभु के नाम और रूप को निरन्तर याद करना — हर श्वास, हर कर्म में।

ध्यान

अपनी अंदर की आँख — तीसरे नेत्र — से उस दिव्य प्रकाश को देखना, जो अंधकार के पीछे छिपा है।

भजन

अंदर के कान से उस आसमानी देववाणी, उस दिव्य ‘शब्द’ को सुनना जो ऊपर से बुला रहा है।

खण्ड ४ · नाम की शक्ति

‘जयगुरुदेव’ नाम: मोक्ष का सच्चा टिकट

‘जयगुरुदेव’ नाम किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि स्वयं उस प्रभु परमात्मा का नाम है — उस दिव्य ध्वनि का वर्णनात्मक रूप जो ऊपर से हमें बुला रही है।

प्रभु का नाम

यह नाम परमात्मा का है, उस दिव्य सांउड का स्वरूप जो ऊपर से चलकर हर जीव को मौन रूप से पुकार रहा है।

संकट में सहायता

प्राण निकलते समय या किसी असाध्य मुसीबत में ‘जयगुरुदेव’ नाम पुकारने से गुरु स्वयं जीव की हिफाजत और रक्षा करते हैं।

बीमारी में उपचार

यदि कोई बेहोश हो तो उसके कान में दस बार यह नाम बोलने से उसे होश आ जाता है। जीवात्मा के लिए यह नाम वह टिकट है जिसे दिखाकर वह यमराज के दण्ड से बच जाती है।

खण्ड ६ · गृहस्थ जीवन

शाकाहार, सदाचार और सेवा

गृहस्थ साधक के लिए सरल आचरण — कोमल, ईमानदार, शाकाहारी, नशा रहित और सेवा से भरा हुआ।

संयम और प्रेम

क्रोध से बचना चाहिए — क्रोध बुद्धि को नष्ट कर देता है। पति-पत्नी को आपस में प्रेम और मेल-जोल से रहना चाहिए।

शुद्ध आहार

सदा शाकाहारी रहें — मांस-मदिरा बुद्धि को पशुओं से भी नीचे गिरा देते हैं। नशा करने वाले जीव अपनी पहचान खो देते हैं और अंततः दुःखों को प्राप्त करते हैं।

ईमानदारी और सेवा

अपने खेती, व्यापार या दफ्तर के काम में पूरी ईमानदारी और मेहनत से काम करें। धोखे और चोरी से बरकत खत्म हो जाती है। दूसरों की सेवा और दया से ही आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

यात्रा को आगे बढ़ाइए

सत्संग की झलकियाँ देखिए, प्रार्थना में बैठिए, मथुरा मन्दिर के दर्शन कीजिए, या संतमत के ग्रंथ खोलिए।