बाबा जयगुरुदेव के प्रवचनों की कोमल झलकियाँ — स्मरण कराते हुए कि मनुष्य जन्म दुर्लभ है, साँसें क्षणिक हैं, और घर का मार्ग केवल नाम के सहारे ही मिलता है।
बाबा जयगुरुदेव द्वारा बताए गए नाम साधना के तीन प्रवाह — एक ही अंतर्धारा के तीन रूप।
प्रभु के नाम और रूप का निरन्तर स्मरण — चलते-फिरते, खाते-काम करते भी हृदय में नाम बना रहे।
अंदर की आँख — तीसरे नेत्र — से उस दिव्य प्रकाश के दर्शन, जो अंधकार के पीछे छिपा है। मौन बैठें, अंदर ही दृष्टि टिकाएँ।
अंदर के कान से उस आसमानी शब्द का श्रवण — वह दिव्य ध्वनि जो हर जीव को अपने धाम पुकार रही है। यही सच्ची भक्ति है।
“दिन के चौबीस घंटों में से कम से कम एक घंटा इस साधना को दीजिए। जैसे पानी गंदे कपड़े को साफ कर देता है, वैसे ही नाम की कमाई जीवात्मा पर जमी कर्मों की धूल को धो देती है।”
यह साधना ही वह सीढ़ी है जिसके सहारे जीवात्मा तन-मन के पिंजरों से बाहर निकलकर, काल के जाल को पार कर, सत्यलोक की ओर चढ़ती है।
महापुरुष हमें यह बताने आते हैं कि हम कहाँ से आए हैं, और वापस अपने सच्चे घर कैसे जा सकते हैं। यह मनुष्य शरीर बार-बार नहीं मिलता; साँसें इस किराये के मकान की पूँजी हैं, जो हर पल कम हो रही हैं।
इस दुर्लभ अवसर का लाभ उठाएँ। प्रतिदिन एक घंटा भी सुमिरन में बैठ जाएँ, ताकि जीवात्मा काल के जाल से मुक्त होकर शब्द की पौड़ी पर सत्यलोक की ओर चढ़ सके।
बाबाजी की वाणी में बार-बार लौटते छह विषय — प्रत्येक अंतर्मार्ग का एक द्वार।
गुरु भक्ति का सच्चा अर्थ है उनकी आज्ञा का पालन करना। यह मार्ग तलवार की पैनी धार पर चलने जैसा कठिन है — पूर्ण विश्वास से ही पार होता है।
सुमिरन, ध्यान और भजन — तीनों मिलकर जीवात्मा को निर्मल कर देते हैं। नाम अंतःकरण की कमाई है।
‘जयगुरुदेव’ नाम किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि स्वयं प्रभु परमात्मा का नाम है — उस दिव्य ध्वनि का स्वरूप जो ऊपर से बुला रही है।
जीवात्मा सतपुरुष का अंश है, काल ने उसे तन-मन के पिंजरे में बंद कर दिया। साधना से वह आवरण उतारकर सत्यलोक लौटती है।
गृहस्थ जीवन में क्रोध से बचें, शुद्ध शाकाहार रखें, परिश्रम और ईमानदारी से काम करें, और दूसरों की सेवा एवं दया का भाव रखें।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने काशी में सिद्ध किया कि बिना पूरे गुरु के जीव कर्मों के बंधन और चौरासी लाख योनियों के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। गुरु ही मोक्ष की कुंजी देते हैं।
यह मनुष्य शरीर एक किराये का मकान है। हर साँस इसकी पूँजी है, जो प्रति पल कम हो रही है। हम अपने असली घर को भुला बैठे हैं और पराए सामानों में उलझ गए हैं।
महापुरुष केवल यह स्मरण कराने आते हैं — और लौटने का साधन भी देते हैं।
सत्संग को मौन में ढलने दीजिए। दैनिक प्रार्थना खोलिए और नाम के साथ बैठिए।
दैनिक प्रार्थना