॥ जयगुरुदेव नाम प्रभु का ॥
साधना के तीन अंग

सुमिरन · ध्यान · भजन

बाबा जयगुरुदेव द्वारा बताए गए नाम साधना के तीन प्रवाह — एक ही अंतर्धारा के तीन रूप।

सुमिरन

प्रभु के नाम और रूप का निरन्तर स्मरण — चलते-फिरते, खाते-काम करते भी हृदय में नाम बना रहे।

ध्यान

अंदर की आँख — तीसरे नेत्र — से उस दिव्य प्रकाश के दर्शन, जो अंधकार के पीछे छिपा है। मौन बैठें, अंदर ही दृष्टि टिकाएँ।

भजन

अंदर के कान से उस आसमानी शब्द का श्रवण — वह दिव्य ध्वनि जो हर जीव को अपने धाम पुकार रही है। यही सच्ची भक्ति है।

मुख्य उपदेश

सत्संग के विषय

बाबाजी की वाणी में बार-बार लौटते छह विषय — प्रत्येक अंतर्मार्ग का एक द्वार।

गुरु भक्ति: तलवार की धार पर चलना

गुरु भक्ति का सच्चा अर्थ है उनकी आज्ञा का पालन करना। यह मार्ग तलवार की पैनी धार पर चलने जैसा कठिन है — पूर्ण विश्वास से ही पार होता है।

  • गुरु आज्ञा का पूर्ण पालन
  • पूर्ण विश्वास और भरोसा
  • अहंकार का त्याग

अंतःकरण की सफाई — शब्द की कमाई

सुमिरन, ध्यान और भजन — तीनों मिलकर जीवात्मा को निर्मल कर देते हैं। नाम अंतःकरण की कमाई है।

  • सुमिरन — नाम का स्मरण
  • ध्यान — दिव्य प्रकाश का दर्शन
  • भजन — आसमानी शब्द का श्रवण

‘जयगुरुदेव’ नाम: मोक्ष का सच्चा टिकट

‘जयगुरुदेव’ नाम किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि स्वयं प्रभु परमात्मा का नाम है — उस दिव्य ध्वनि का स्वरूप जो ऊपर से बुला रही है।

  • संकट में रक्षा का साधन
  • अंतिम श्वास का सहारा
  • यमराज के दण्ड से मुक्ति

सुरत की यात्रा: पिंजरे से मुक्ति तक

जीवात्मा सतपुरुष का अंश है, काल ने उसे तन-मन के पिंजरे में बंद कर दिया। साधना से वह आवरण उतारकर सत्यलोक लौटती है।

  • स्थूल, सूक्ष्म, कारण, लिंग शरीर
  • सहस्रदल, त्रिकुटी, सुन्न, महाकाल
  • सत्यलोक — असली घर

शाकाहार, सदाचार और सेवा

गृहस्थ जीवन में क्रोध से बचें, शुद्ध शाकाहार रखें, परिश्रम और ईमानदारी से काम करें, और दूसरों की सेवा एवं दया का भाव रखें।

  • क्रोध का त्याग
  • शाकाहार और संयम
  • ईमानदारी और सेवा

पूरे गुरु के बिना ज्ञान नहीं

गोस्वामी तुलसीदास जी ने काशी में सिद्ध किया कि बिना पूरे गुरु के जीव कर्मों के बंधन और चौरासी लाख योनियों के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। गुरु ही मोक्ष की कुंजी देते हैं।

  • अंतर्दृष्टि का प्रमाण
  • पंडितों की आंतरिक अनुभूति
  • गुरु — मोक्ष की कुंजी

अब प्रार्थना में बैठिए

सत्संग को मौन में ढलने दीजिए। दैनिक प्रार्थना खोलिए और नाम के साथ बैठिए।

दैनिक प्रार्थना