जयगुरुदेव जयगुरुदेव जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव
जयगुरुदेव जयगुरुदेव जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
मेरे मात पिता गुरुदेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
सब देवन के देव गुरुदेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
तिनके चरण कमल मन सेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
जीव काज जग आये गुरुदेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
अपना भेद बताये गुरुदेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
सत्य स्वरूपी रूप गुरुदेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
अलख अरूपी रूप गुरुदेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
अगम स्वरूपी रूप गुरुदेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
पुरुष अनामी आप गुरुदेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
सबके स्वामी आप गुरुदेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
उनके शरण मेरे मन सेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।
जय गुरुदेव मेरे स्वामी गुरुदेव, जयगुरुदेव जय जयगुरुदेव।।
आरती जयगुरुदेव अनामी, कीन्ही कृपा दरश दियो स्वामी
आरती जयगुरुदेव अनामी, कीन्ही कृपा दरश दियो स्वामी।।
चित वत पंथ रहूँ दिन राति, तुमहि देख शीतल भई छाती।
हे प्रभु समरथ अन्तर यामी — आरती जयगुरुदेव अनामी।।
मैं मूरख क्रोधी खल कामी, लोभी निपट मोह पथ गामी।
तेरी सेवा भक्ति न जानी। — आरती जयगुरुदेव अनामी।।
दया धर्म चित्त नहीं समाये, शील क्षमा सन्तोष न आये।
अस मैं हीन अधीन निकामी — आरती जयगुरुदेव अनामी।।
दासों की विनती सुन लीजै, शरण आश्रय हमको दीजै।
तब पद कंज नमामि नमामि।
आरती जयगुरुदेव अनामी,
कीन्ही कृपा दरश दियो स्वामी।।
अब अपना बना लो हमें सतगुरू प्यारे
अब अपना बना लो हमें सतगुरू प्यारे,
रहूँ जिससे निर्भय सहारे तुम्हारे।
जगत में है समरथ न कोई दिखाता,
बताओ तुम्हीं किसके जाऊँ दुआरे।
ये माना कि सिर मेरे पापों की गठरी,
मगर तेरे बिन कौन स्वामी उतारे।
युगों से ये नैया भँवर में पड़ी है,
दया करके अबकी लगा दो किनारे।
अगर अब की डूबी तो गफलत न मेरी,
दयालू शरण में जो आया तुम्हारे।
है विश्वास अबकी न डूबेगी नैया,
जयगुरूदेव पतवार मेरी सम्हाले।
अब सौंप दिया इस जीवन का
अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में!
हे जीत तुम्हारे हाथों में, और हार तुम्हारे हाथों में।
मेरा निश्चय बस एक यही, एक बार तुम्हें पा जाऊँ मैं!
अर्पण कर दूँ दुनिया भर का, सब प्यार तुम्हारे हाथों में!
यदि जग में रहूँ तो ऐसे रहूँ, ज्यों जल में कमल का फूल रहे!
मम अवगुण दोष समर्पित हों, भगवान तुम्हारे हाथों में!
यदि मानुस का मुझे जनम मिले, तब इन चरणों का मैं भक्त बनूँ!
इस भक्त की नस-नस, रग-रग का, हो तार तुम्हारे हाथों में!
जब-जब संसार का कैदी बनूँ, निष्काम भाव से काम करूँ!
फिर अंत समय में प्राण तजूँ, निराकार तुम्हारे हाथों में!
मुझ में तुझ में बस भेद यही, मैं नर हूँ तुम नारायण हो!
मैं हूँ संसार के हाथों में, संसार तुम्हारे हाथों में!
गुरू का ध्यान कर प्यारे
गुरू का ध्यान कर प्यारे। बिना इसके नहीं छुटना।।
नाम के रंग में रंग जा। मिले तोहि धाम निज अपना।।
गुरू की सरन दृढ़ कर ले। बिना इस काज नहीं सरना।।
लाभ और मान क्यों चाहे। पड़ेगा फिर तुझे देना।।
करम जो जो करेगा तू, फ़ वही फिर भोगना भरना।।
जगत के जाल में ज्यों त्यों। हटो मरदानगी करना।।
जिन्होंने मार मन डाला। उन्हीं को सूरमा कहना।।
बड़ा बैरी ये मन घट में। इसी का जीतना कठिना।।
पड़ो तुम इसही के पीछे। और सबही जतन तजना।।
गुरू की प्रीत कर पहिले। बहुरि घट शब्द को सुनना।।
मान लो बात यह मेरी। करें मत और कुछ जतना।।
हार जब जाय मन तुझसे। चढ़ा दे सुर्त को गगना।।
और सब काम जग झूठा। त्याग दे इसी को गहना।।
कहैं स्वामी समझाई। गहो अब नाम की सरना।।
गुरू चरण कमल बलिहारी रे
गुरू चरण कमल बलिहारी रे, मेरे मन की दुविधा टारी रे।। टेक।।
भव सागर में नीर अपारा, डूब रहा नहीं मिलत किनारा।
गुरू पल में लीन उबारी रे।। १।।
गुरू चरण कमल बलिहारी रे।
काम क्रोध मद लोभ लुटेरे, जनम जनम के बैरी मेरे।
गुरू ने दीन्हा मारी रे।। २।।
गुरू चरण कमल बलिहारी रे।
भेद भाव सब दूर कराएं, पूरन ब्रह्म एक दर्शाएं।
घट घट ज्योति निहारी रे।। ३।।
गुरू चरण कमल बलिहारी रे।
योग युक्ति गुरूदेव बताऐं, सब भक्तन के आनन्द छायें।
मानुष देह सुधारी रे।। ४।।
गुरू चरण कमल बलिहारी रे।
गुरूदेव तुम्हारे चरणों में
गुरूदेव तुम्हारे चरणों में, सतकोटि प्रणाम हमारा है।
मेरी नइया पार लगा देना, कितनों को पार उतारा है।
मैं बालक अबुध तुम्हारा हूँ, तुम समरथ पिता हमारे हो।
मुझे अपनी गोद बिठा लेना, दाता लो भुजा पसारा है।
यद्यपि सांसारिक ज्वालायें, हम पर प्रहार कर जाती हैं।
पर शीतल करती रहती है, तेरी शीतल अमृत धारा है।
जब आँधी हमें हिला देती, ठंडी जब हमें कंपा देती।
मुस्कान तुम्हारे अधरों की, दे जाती हमें सहारा है।
कुछ भुजा उठा कर कहते हो, कुछ महामन्त्र सा पढ़ते हो।
गद-गद हो जाता हूँ स्वामी, मिल जाता बड़ा सहारा है।
उस मूर्ति माधुरी की झांकी, यदि सदा मिला करती स्वामी।
सौभाग्य समझते हम अपना, कौतूहल एक तुम्हारा है।
फिर बारम्बार प्रणाम करूँ, चरणों में शीश झुकाता हूँ।
अब पार अवश्य हो जाऊँगा, तुमने पतवार सम्भारा है।
दयालु दया सिन्धु हैं नाम तेरे
दयालु दया सिन्धु हैं नाम तेरे,
तो उपर दया क्यों नहीं होती मेरे।
तुम हो सिन्धु तो बूँद मैं भी तुम्हारी,
किस अपराध से मैं बँधी काल घेरे।
तड़पती हूँ दिन रात मिलने को तेरे,
मैं बन्धन में, तुम सुख की लेते हिलोरे।
तेरी अंश मैं इतना दुख पा रही हूँ,
पिता मेरे क्यों चुप खड़े दृष्टि फेरे।
दया दृष्टि एक बार यदि मुझ पर होती,
तो दुख जन्म मरने के कट जाते मेरे।
मन तू भजौ गुरू का नाम
मन तू भजौ गुरू का नाम — २
दया मेहर से नर तन पायौ, मत करना अभिमान।
मन तू भजौ गुरू का नाम।
एक दिन खाली पड़ा रहेगा, जाय बसे श्मशान।
मन तू भजौ गुरू का नाम।
जो धन तुझको दिया गुरू ने, इससे कर कुछ काम।
मन तू भजौ गुरू का नाम।
अन्त समय यों ही लुट जायेगा, संग न जाय छदाम।
मन तू भजौ गुरू का नाम।
यह संसार रैन का सपना, आय किया विश्राम।
मन तू भजौ गुरू का नाम।
चार दिन के संगी सब हैं, अन्त ना आबे काम।
मन तू भजौ गुरू का नाम।
तासे चेत करो सत संगत, भजन करो आठों याम।
मन तू भजौ गुरू का नाम।
यही भजन तेरे संग चलेगा, पावेगा आराम।
मन तू भजौ गुरू का नाम।
दया मेहर सतगुरू से लेकर, चलो त्रिकुटी धाम।
मन तू भजौ गुरू का नाम।
काल करम से बन्धन छुटै, मिले पुरूष सतनाम।
मन तू भजौ गुरू का नाम।
सतगुरू सतनाम
सतगुरू सतनाम, तुमको लाखों प्रणाम।
कोटिन सूरज चाँद सितारे, रोम रोम में करें उजारे।
सत्त पुरूष करतार, तुमको लाखों प्रणाम।।
अरबों सूरज चाँद सितारे, रोम रोम में करें उजारे।
अलख पुरूष करतार, तुमको लाखों प्रणाम।।
खरबों सूरज चाँद सितारे, रोम रोम में करें उजारे।
अगम पुरूष करतार, तुमको लाखों प्रणाम।।
नील नील शशि भानु व तारे, रोम रोम में करें उजारे।
अनामी पुरूष करतार, तुमको लाखों प्रणाम।।
जय गुरूदेव दयाल, तुमको लाखों प्रणाम।।
सतगुरु पार लगाओ मोरी नैया
सतगुरु पार लगाओ मोरी नैया,
मैं तो बहि मझदार,
लगाओ मोरी नैया सतगुरु पार।
ये जित जाऊँ उत काल सतावे,
भरम रही हर बार,
लगाओ मोरी नैया सतगुरु पार।
मैं अनजानी तुम सब जानो,
गुरु मेरे अगम अपार,
लगाओ मोरी नैया सतगुरु पार।
मैं दुखियारी तड़प रही हूँ,
नित तेरे दरबार,
लगाओ मोरी नैया सतगुरु पार।
समरथ जान सरन आई,
ये मेरे सरकार,
लगाओ मोरी नैया सतगुरु पार।
मुझ अबला की लाज बचाओ,
समरथ दीन दयाल,
लगाओ मोरी नैया सतगुरु पार।
जयगुरुदेव दया के सागर,
सुन लो मोरी पुकार,
लगाओ मोरी नैया सतगुरु पार।
गुरु का सहारा मिला गर ना होता
गुरु का सहारा मिला गर ना होता,
तो गफलत में सब उम्र यूँ ही में खोता।।
तबाही हुई खूब होती हमारी,
क्या सत क्या असत्य जान पाया ना होता।।
हुई फिक्र होती ना प्रभु के मिलन की,
चला जाता दुनिया से यूँ सोता सोता।।
ना पानी में पाता ना पत्थर में पाता,
जो घट का यह ताला खुलाया ना होता।।
प्रभु साध हरदम जो खोजे सो पावे,
यह विश्वास मन को भी आया ना होता।।
ना साथी कोई अंत में साथ देता,
जो साथी ना गुरु को बनाया मैं होता।।
हमारे से लाखों यह खानों में पिटते,
मनुज रूप सतगुरु बनाया ना होता।।
गुरुदेव दया इतनी कर दो
गुरुदेव दया इतनी कर दो,
हम को भी तुम्हारा प्यार मिले।
कुछ और भले ही मिले न मिले,
गुरु दर्शन का अधिकार मिले।।
इस जीवन में जीना मुश्किल,
यह जीवन भी क्या जीवन है।
जीवन तब जीवन बनता है,
जब जीवन का आधार मिले।।
इस मारग पर चलते चलते,
सदियाँ ही नहीं युग बीत गए।
मिल जाये पथिक मारग असली,
हमको मुक्ति दातार मिले।।
कुछ और भले ही मिले न मिले,
गुरु दर्शन का अधिकार मिले।।
हम जनम जनम के प्यासे हैं,
गुरु तुम करुणा के सागर हो।
करुणा निधि के करुणा रस की,
इक बूँद हमें इस बार मिले।।
कुछ और भले ही मिले न मिले,
गुरु दर्शन का अधिकार मिले।।
सब कुछ पाया इस जीवन में,
बस एक तमन्ना बाकी है।
हर प्रेम पुजारी को अपने,
मन मन्दिर में दातार मिले।।
कब से गुरु दर्शन पाने को,
हम आस लगाये बैठे हैं।
पल दो पल भीतर आने की,
अनुमति अनुपम सरकार मिले।।
कुछ और भले ही मिले न मिले,
गुरु दर्शन का अधिकार मिले।।
जिसने जो कुछ तुमसे माँगा,
उसने है वही तुमसे पाया।
दुनिया को मिले दुनिया लेकिन,
हमको तो तेरा दरबार मिले।।
कुछ और भले ही मिले न मिले,
गुरु दर्शन का अधिकार मिले।।
अगर तेरा मिलता सहारा नहीं है
अगर तेरा मिलता सहारा नहीं है,
तो दुनियाँ में कोई हमारा नहीं है।।
अगर मुझको अबकी न अपना सकोगे,
तो फिर बन्दा तेरा तुम्हारा नहीं है।।
कठिन काल निज पास में बांध लेगा,
तो कहना नहीं कि गोहारा नहीं है।।
बड़े भाग से अब की नर तन मिला है,
उसे मोह के बस सुधारा नहीं है।।
इसी से दया भीख मैं मांगती हूँ,
तुम्हें छोड़ कोई हमारा नहीं है।।
बचाया जिसे सतगुरु की दया ने,
उसे कोई यमदूत मारा नहीं है।।
उबारी न गुरु की दया ने जिसे है,
उसे और कोई उबारा नहीं है।।
जिसे आप देते सहारा नहीं हैं,
उसे कोई देता सहारा नहीं है।।
हमारी ये नइया भँवर में पड़ी है,
दिखाई भी देता किनारा नहीं है।।
बचालो बचालो दयालू कृपालू,
मैं डूबूँगी अगर तुमने तारा नहीं है।।
जयगुरुदेव जय जय जय गुरुदेव प्यारे,
तुम्हें छोड़ दिनों का प्यारा नहीं है।।
मुक्ति दिवस प्रार्थना — जयगुरूदेव नाम प्रभु का
जयगुरूदेव ध्वजा लहरायें,
मानव जीवन सफल बनायें।
सत्य अमृत रस झरने वाला,
भक्ति भावना भरने वाला।
दुनिया का तम हरने वाला,
देशों देश विचरने वाला।
शान्ति ध्वज नभ में फहरायें,
मानव जीवन सफल बनायें।।
शील क्षमा संतोष लिए है,
सर्व शांति का ध्येय लिये है।
अजब रंग अनुराग हृदय में,
प्रेम सुधा रस पेय लिये है।
सबको सत्य मार्ग दिखलाये,
मानव जीवन सफल बनाये।।
एक रंग की ध्वजा है प्यारे,
तीन रंग से है यह न्यारे।
अरब खरब शशि भानु व तारे,
ध्वज के मध्य प्रकाशित सारे।
पल-पल नभ आनंद बढ़ाये,
मानव जीवन सफल बनाये।।
ध्वजा के नीचे जो कोई आवे,
जन्म मरण उसका छूट जावे।
जीवन का वांछित फल पाकर,
अन्त समय प्रभु में मिल जावे।
सब को सरल मुक्ति बतलाये,
मानव जीवन सफल बनाये।।
विधि हरि-हर ने उसे उठाया,
व्यास वशिष्ठ आदि मन भाया।
राम कृष्ण सब गाते आये,
संतों ने गुण तत्व बताया।
सबके घर-घर यह फहराये,
मानव जीवन सफल बनाये।।
सतयुग सत्य ध्वजा लहराया,
त्रेता द्वापर में फहराया।
कलयुग जयगुरूदेव ध्वजा ले,
सब जीवों को पार लगावें।
प्रेमी सभी मिलकर के गायें,
मानव जीवन सफल बनाये।।
जो कोई इसका गुण गावे,
सत्य ध्वजा पर बलि बलि जावे।
धर्म ध्वजा अपनी महिमा से,
जीवों को निज घर पहुंचावे।
जग सारा गुण गौरव गावे,
मानव जीवन सफल बनाये।।
जयगुरुदेव दया करो मेरे,
दुख हर्ता मैं शरण में तेरे।
पांचो दूत भूत अस लिपटे,
ममता मोह विविध विधि घेरे।
सबको नाथ प्रभु पार लगाये,
मानव जीवन सफल बनाये।।
धाम अपने चलो भाई। पराये देश क्यों रहना
धाम अपने चलो भाई। पराये देश क्यों रहना।।
काम अपना करो जाई। पराये काम नहिं फसना।।
नाम गुरु का सम्हाले चल। यही है दाम गठ बंधना।।
जगत का रंग सब मैला। धुला ले मान यह कहना।।
भोग संसार कोई दिन के। सहज में त्यागते चलना।।
सरन सतगुरु गहो दृढ़ कर। करो यह काज पिल रहना।।
सुरत मन थाम अब घट में। पकड़ धुन ध्यान घर गगना।।
फंसे तुम जाल में भारी। बिना इस जुक्ति नहीं खुलना।।
गुरु अब दया कर कहते। मान यह बात चित धरना।।
भटक में क्यों उमर खोते। कहीं नहिं ठीक तुम लगना।।
बसो तुम आय नैनन में। सिमट कर एक यहाँ होना।।
दुई यहाँ दूर हो जावे। दृष्टि ज्योति में धरना।।
श्याम तजि सेत को गहना। सुरत को तान धुन सुनना।।
बंक के द्वार धंस बैठो। तिरकुटी जाय कर लेना।।
सुन्न चढ़ जा धसो भाई। सुरत से मानसर न्हाना।।
महासुन चैक अंधियारा। वहाँ से जा गुफा बसना।।
लोक चैथे चलो सज के। गहो वहाँ जाय धुन बीना।।
अलख और अगम के पारा। अजब एक महल दिखलाना।।
गुरू चरणों में अपने लगा लीजै
गुरू चरणों में अपने लगा लीजै।
मेरे भाग्य को स्वामी जी जगा दीजै।
मो सम पापी जगत कोउ नाहीं,
मेरे पापों की गठरी जला दीजै।
काम क्रोध मद लोभ सतावे,
इन दुष्टों को स्वामी जी भगा दीजै।
काल और माया हमें भरभावे,
इन दोउ से प्रभु जी बचा लीजै।
तुम्हरे दरश की ये अंखियाँ हैं प्यासी,
दर्शन देके प्यास बुझा दीजै।
बैन सुनन को श्रवण मेरे व्याकुल,
अमृत भरी बाणी सुना दीजै।
जोड़ो री कोई सुरत नाम से
जोड़ो री कोई सुरत नाम से।। टेक।।
यह तन धन कुछ काम न आवे। पड़े लड़ाई जाम से।। १।।
अब तो समय मिला अति सुन्दर। सीतल हो बच घाम से।। २।।
सुमिरन कर सेवा कर सतगुरु। मनहि हटाओ काम से।। ३।।
मन इन्द्री कुछ बस कर राखो। पियो घूँट गुरु जाम से।। ४।।
लगे ठिकाना मिले मुकामा। छुटो मन के दाम से।। ५।।
भजन करो छोड़ो सब आलस। निकर चलो कलि ग्राम से।। ६।।
दम दम करो बेनती गुरु से। वही निकारें तन चाम से।। ७।।
और उपाव न ऐसा कोई। रतन करो सुबह शाम से।। ८।।
प्रीत लाय नित करो साध संग। हट रहो जग जे ख़ासो आम से।। ९।।
राधास्वामी कहैं सुनाई। लगो जाय सतनाम से।। १०।।